मंगलवार, 28 जुलाई 2009

भोपाल और अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फ़िल्म समारोह

विवेक मिश्रा
भोपाल में कला और संस्कृति का चोली दामन का साथ रहा है ,कुछ इसी तरह का मुखरित रूप दिखा अबकी बार आयोजित अन्तराष्ट्रीय जनजातीय फ़िल्म समारोह २००९ में ,विश्व भर में आदिम जनजातियों पर आधारित छोटे समय में बड़े यथार्थ को कह देने का माद्द्दा रखने वाली लगभग ७० छोटी फिल्मो के प्रदर्शन द्वारा रविन्द्र ,शहीद और भारत भवन में दिखायी गई ये फिल्मे वास्तव में विश्व भर में फैले वनवासी समूहों की बात कहती नज़र आई जिन्हें हमेशा से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है १९ जून से २१ जून के बीच प्रर्दशित कुछ देखी फिल्मो के अनुभव आप से बयान करना चाहूंगा जिन्हें केवल देखा और सुना नही जाना चाहिए बल्कि चिंतन से निराकरण की और बढना होगा .......................... यह दृश्य जो आप देख रहे है वह ४७ मिनट की फ़िल्म "सहारा क्रोनिकल" की है जो मूल रूप से फ्रेंच में है फ़िल्म के टाइटल के अनरूप स्विट्जरलैंड की डायरेक्टर उर्सुला बिएमन्न ने छोटे कैनवास पर बड़े यथार्थ के रूप में भारी संख्या में सब सहारा से यूरोप की ओर पलायन को दिखाया है इस सॉर्ट फ़िल्म में गतिशीलता की राजनीति दृश्यता तथा संतोष जो की वर्तमान वैश्विक भूगोलिक राजनीति के मन में है ,एक यायावारी समुदाय की हैसियत से दुआरेग जनजाति का ,सहारा के बाहर पलायन करने वालो की मुख्य भूमिका है फ़िल्म में पलायन के रीति और कारणों का अध्यन जबरदस्त है।बिएमन्न ने मोरोक्को ,मौरितिअना तथा निगेर में स्थित ट्रांस सहारा नेटवर्क के प्रमुख प्रवेशद्वार तथा केन्द्र की यात्रा करके इकठा की गई है।
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फ़िल्म-आल द वोर्ड्स अ स्टेज निर्माता -निर्मल चंदरभाषा-इंग्लिश सारांश - यह फ़िल्म गुजरात के सूफीयाना पहलू पर आधारित है ऐसा माना जाता है की कुछ लोग पानी के एक वजनी जहाज से ७०० साल पहले निकले थे लेकिन जब वे लौटे तो हवाई जहाज से रास्ते के सफर के दौरान वे अपने मूल निवास स्थान की जानकारी और भाषा भूल गए लेकिन उन्हें अपना संगीत और नृत्य जैसे का वैसा याद रहा जो उनके इतिहास को बयां करता है
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फ़िल्म टाइटल -old man peter
भाषा -रशिया
निर्माता -इवान गोलोनेव
सिनोप्सिस-यह फ़िल्म हमको कजायम नदी के किनारे रहने वाले आख़िरी जीवित बूढे आदमी की पीटर सेनेज़पोव की दुनिया में ले जाती है जो साइबेरिया टैग के सुदूर गहरे इलाके में अकेले रहता है ,खान्त्ति लोगो का क्षेत्र रूस में नैचुरल तेल निकालने का मूलभूत स्रोत है रूस में नैचुरल तेल इसी क्षेत्र से निकाला जाता है .बड़ी -बड़ी तेल कम्पनियों ने साइबेरिया के उत्तरी इलाके में वृहत तरीके से ज़मीनों के खरीद फरोख्त की है तथा वंहा के रहवासी जिनकी विरासत से ज़मीने है उनको मजबूर कर दिया है की वे अपनी ज़मीने छोड़ दे शायद बेघर करके रोज़गार देने का ये तरीका पूंजीपतियों को विरासत में मिला है
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फ़िल्म टाइटल -geles
english title -flower
language-lithunian
director-giedrius zubavicius
synopsis- इस फ़िल्म के नायक बच्चे है जो विलिनिअस शहर के विभिन्न हिस्सों में फूल बेचते है ,इसमे से एक बच्चा कब्रिस्तान के पास फूल बेचता है और जो बाद में कब्रों पर चढाये गए फूलो को फ़िर से बेच देता है ,कारण लड़के की चालाकी नही बल्कि मजबूरी है जो गरीबी की मार झेल रहा है और अपने माँ बाप को आर्थिक मदद देता है इस बच्चे के कई और दोस्त है जो अन्य जगहों पर फूल बेचते है फ़िल्म में मोड़ तब आता है जब कब्रिस्तान पर फूल बेचने वाले वाले बच्चे के माँ बाप के आग में जल कर मृत्यू हो जाती है और बच्चो के जीवन में एक बदलाव होता है जो फ़िल्म की सार्थकता को और ज्यादा सिद्ध करती है
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film- everything has its time
language-akha ,thai,english
director-joel gerhson
synopsis-यह फ़िल्म आज की दुनिया में अखा नामक एक पहाडी जनजाति पर केंद्रित है जिन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है ,२१ शातब्दी के विश्व भर में असमान विकास ने इनको भी अस्तित्व की लडाई लड़ने पर मजबूर कर दिया है
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film title-flores the ruanda
english title -flowers oe rwanda
language-english,french
director -david munoz
synopsis- यह फ़िल्म रवांडा सामूहिक हत्या कांड जिसने लगभग आठ लाख लोगो को बलि ली १४ वर्ष बाद आज उस देश को तमाम यातनाओं के बाद वर्तमान परिवेश पर नज़र डालती हुई सवाल खडा करती है क्या पीड़ित और हत्यारे एक साथ रह सकते है ,यंहा की शिक्क्षा और दुबारा ऐसी घटना नही हो सकती तमाम सवाल बटोरे वयक्तिक ज़िम्मेदारी पर भी सवाल खड़ा करती है ,और उत्तरदायित्व का भी बोध कराती है
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फ़िल्म-the lost water
language-guzrati
director-dakxin bajarange
synopsis-भारत में कुल उत्पादित नमक का ७३% भाग गुजरात राज्य से प्राप्त होता है जिसमे से लगभग ६०% हिस्सा रन ऑफ़ कच्छ (ल .र. क.}से मिलता है यहाँ के मजदूर अगरियो के नाम से जाने जाते है ,यह मुख्या रूप से कोली और चूवालिया जनजाति के है ,एक मजदूर के रूप में न केवल ये सिर्फ़ पारिश्रामिक में भेद भावः के शिकार है बल्की अपने काम की घातक प्रकृती के कारण ये गभीर शारीरिक और मानसिक व्याधियों को झेलते है सिर्फ़ अकेले खरागादों गाँव में ४३७ विधवा रहती है अत्यधिक गर्म इलाके में ये तमाम त्वचा रोग और अंधत्व का शिकार हो रहे है इनकी सुध लेने को कोई नही ........
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language-english,french
director-tsitsi dangarembga
synopsis -सूखे का आक्रमण हो चुका है ,पिता अपनी पत्नी को रात्री के खाने से बाहर भगा देता है गुस्से में जब माँ अपने पति को चुनौती देती है पिता एक घ्रिदित उद्देश्य से गड्ढा खोदता है लेकिन उसे इस बात का डर भी है की उसकी पत्नी भी उसी ताकत से प्रहार कर सकती है ,अतः वह गधा आधा छोड़ देता है ,यह फ़िल्म जिम्बाब्वे में बनी एक स्त्री की व्यथा कहती मानव संवेदना को छु जाती है जो एक मोशन पिक्चर है
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ऐसी हजारो फिल्मे विश्व भर में बन रही है जो मुद्दों से भरी है ,सवाल यह है के क्या ये हम और आपमें बदलाव कर पायेगी या फिर यह समारोह का हिस्सा ही बन कर रह जायेगी क्या हम केवल सोची समझी बनायी गयी चाल के तहत सिर्फ़ बाज़ार का हिस्सा बने रहेंगे जहा न कोई आवाज़ होती है न कोई चीख निकलने दी जाती है उनके लिए केवल खरीद फरोख्त ही मानवता है, अधिकार का हनन ही क़ानून है ,और अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर कर देना ही सिद्धांत .....फ़ैसला आपके हाथ ....जारी रहेगा

3 टिप्‍पणियां:

Rajat ने कहा…

अच्छा लिखा है आपने .इतना बड़ा कार्यक्रम भोपाल मैं पिछले साल से आयोजित हो रहा है.पर शायद,जितनी सिद्दत से इसे नाम और ख्याति मिली चाहिए थी वो नहीं मिल पा रही है.आपका प्रयास अच्छा है.यदि जादा से जादा लोग इस बारे मैं जाने तो बहुत अच्छा होगा.आपका ब्लॉग इस्स्में महती भूमिका निभा सकता है.मेरी हार्दिक सुभकामनाएँ.

Bhoopendra a media man ने कहा…

behatreen hai, jung kalam ki chalti rahe.

ashu journalist ने कहा…

bahut sahi .........