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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008
एक नज़र
विवेक/चक दे इंडिया में वाकई रंग दे बसंती हो जाए तो निश्चित ही तारे जमी पर आ हीं जायेंगे लेकिन गौरतलब है की जैसे जैसे भारत देश का इतिहास बदला है वैसे वैसे बॉलीवुड के इतिहास में भी कई रंग देखने को मिलते है ,और उसने अपने अच्छे बुरे प्रयासों से हमे कुछ न कुछ या फिर बहुत ज्यादा समय समय पर चेताया है विगत दो सालो में आई फिल्मो की श्रेणी में "चक दे इंडिया "जिसने भारत देश के राष्ट्रीय खेल "हाकी"जिसको स्थानीय खेल जैसा भी सम्मान नही मिल पा रहा है ,को लोगो के मानस पटल केंद्रित करते हुए एक महत्वपूर्ण खेल बताते हुए लोगो के दिलों दिमाग पर छाई तो दूसरी तरफ़ रंग दे बसंती जो आधुनिकता में भटके युंवाओ को अपने अन्दर बदलाव करके देश बदलने का माद्दा पैदा करने का संदेश दे गई तो इन सबसे इतर आस्कर के दौड़ में दौड़ती तारे ज़मी पर ने एवरी चाइल्ड स्पेशल का नारा देते हुए अपने बच्चों को रेस का घोड़ा समझने वालो के मुहँ पर तमाचा मारा और एक ऐसे बाल रोग की तरफ़ दुनिया का ध्यान खिचवाया जिसे हम सभी बच्चों की नौटंकी कहकर नजरअंदाज कर देते थे और दूसरी तरफ़ डीस्लेक्सिया पीड़ित बच्चों को आइन्स्टीन ,लियोनार्दो दा विन्ची ,जो सभी बचपन में इसी रोग से पीड़ित थे के सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए बच्चों के प्रोत्साहन को बढ़ाने का काम किया खैर ,सिनेमा हमारी ही प्रतिक्रया का दर्पण है और अपनी ही प्रतिक्रया देखकर हम कितना सबक लेते हैं यह हमारे ऊपर ही निर्भर है इसीलिए लगे रहो मुन्ना भाई जारी रहेगा........
गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008
कलम...और चिठ्ठी ............!
विवेक /अभी हालिया में श्याम बेनेगल की फ़िल्म वेलकम टू सज्जनपुर ने एक बार फिर आज के आधुनिक युग में जब संचार के कई आयाम मौजूद है ,तभी e-मेल ,ब्लॉग के जंजाल ,टेलीफोन से बाहर निकलकर हमारी पुरानी संचार व्यवस्था जिसे हम चिट्ठी या फिर पत्र कहते हैं को हमारे मानस पटल पर केंद्रित करते हुए (चिठ्ठी आई है) की याद दिलाई है खैर कलम की ताकत सीमित नही हो सकती की वह कभी पत्रकार या लेखक के हाथो का साधन मात्र बन जाए बल्कि कलम ने स्वय अपनी ताकत से लेखक या पत्रकार को मजबूर किया है की मुझे पकड़ और लिख लेकिन इससे आगे बढ़कर सोचे तो शायद हमारी रक्षा कर रहे जवान हो या घर में आश लगाए माँ बाप जो एक गरीब विकसित देश के अंग है के लिए चिट्ठी, उस कलम स्याही या एक सफ़ेद कागज़ के जोड़ से कही ज्यादा है दोस्तों कलम की ताकत वंहा भी दीखाई देती थी जब डाकिया चाचा कोई चिठ्ठी लेकर महीनो पर किसी दरवाजे पर पहूंचते थे सायद तब यह फक्र की बात होती थी और आज भी ,मुख्य बात यह की चिठ्ठी में जो मार्मिकता ,खुशी,संवेदनशीलता ,अहसाश ,मिलता है शायद वो खुशी अहसाश मेसेज या मेल नही दे पाते हो.......
जारी रहेगा.....
जारी रहेगा.....
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