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सोमवार, 13 जुलाई 2009

चुनाव में सब नंगे उर्फ़ खूब बिके अखबार

राजीव यादव

पत्रकारिता में मील का पत्थर साबित हुए ‘स्वराज्य’ जिसके आठों संपादकों जिसमें कुछ को पत्रकारीय मूल्यों के लिए कैद तो कुछ को काले पानी तक की सजा हुयी के शहर इलाहाबाद में अखबार गलीजपन की हदें स्थापित कर रहे हैं। बीतें लोकसभा चुनावों में अखबारों ने पैसे लेकर खबरों को विज्ञापन के रुप में ही नहीं बल्कि खबरों व खबरों के स्थान के लिए प्रत्याशियों के सामने लाखों रुपये के पैकेज तक पेश किये। खुलेआम यह ऐलान किया कि बिना पैसा लिये खबर नहीं छापेंगे। चुनाव के परवान चढ़ने के बाद यह अभियान इतना तेज हो गया कि अखबारों का दूसरे अखबार से प्रतिस्पर्धा बस इसी के लिए रह गयी कि कौन कितना बड़ा पैकेज लिया।
बौद्धिक विरासत की पहचान वाले इलाहाबाद की दोनों लोकसभा सीटों पर दैनिक जागरण और हिंदुस्तान सबसे ज्यादा पैकेज लेने वाल अखबारों में रहे। दैनिक जागरण जिसने ‘जन जागरण’ का ठेका लिया था ने कांग्रेस से बसपा में आये राजनीतिक गणितबाज अशोक बाजपेयी के सर्वसमाज के लिए अपने को उनके सुपुर्द कर दिया था। ऐसा नहीं कि दैनिक जागरण ने सिर्फ बाजपेयी की ही खबरों को पैसा लेकर छापा, उसने सबके पास अपनी नीलामी के पैकेज भेजे थे। जिसमें बाजपेयी सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले निकले। अखबारी सूत्रों के मुताबिक उन्होंने 55 से 60 लाख रुपये खबरों के स्थान खरीदने के लिए दिये थे।
दैनिक ने हद तो तब कर दी जब 14 अपैल की सतीश चंद्र मिश्रा की सभा की खबर को आधे पेज के विज्ञापन के रुप में छापा। जबकी अन्य समाचार पत्रों में यह खबरों के रुप में भले ही नीलामी में आवंटित जगह पर छपी। मीडिया के अंदरुनी जानकारों के मुताबिक चुनावों में बाजार गर्म होने के कारण इसकी कीमत एक से सवा लाख के तकरीबन थी। खबरों की नीलामी के इस खेल को प्रसिद्ध गांधीवादी और आजादी बचााओ आंदोलन के संयोजक बनवारी लाल शर्मा जनता के विवेक पूर्ण तरीके से सूचना पाने के हक को प्रभावित करने वाला मानते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया में आए विदेशी निवेश ने हमारी पत्रकारिता को पराभव की ओर अग्रसर कर दिया है। मीडिया जिसकी जिम्मेदारी समाज निर्माण करना और तीनों स्तंभों की रखवाली करना था आज उसका काम सबको भ्रष्ट बनाने का हो गया है।
आज जब पूरे विश्व में मंदी का ढिढोरा पीटा जा रहा है और छटनी की जा रही है तब यह अहम सवाल है कि आखिर चुनावों के कुछ महीनें पहले अखबारों ने कैसे अपने नए संस्करण शुरु किये। हिन्दुस्तान ने भी इस चुनावी महासमर में अपनी इलाहाबाद संस्करण की नयी दुकान खोली। सिविल लाइन्स स्थित काफी हाउस की बैठकों में इन दिनों इसी पर चर्चा चल रही है कि किसने कैसे कितना कमाया। पर हिन्दुस्तान के नए संस्करण की चर्चा उसकी खबरों को लेकर नहीं बल्कि उसके पैकेजों को लेकर है। इस का हिसाब हिन्दुस्तान को भविष्य में भुगतना पड़ेगा। क्योंकि अधिक प्रसार वाले अखबार तो चुनावों बाद भी बच जाएंगे क्योंकि उनकी जमीन पुरानी है। पर हिन्दुस्तान के साथ ऐसा नहीं होगा। चुनाव के दरम्यान अखबार के दफ्तर वार रुम में तब्दील हो गए थे जहां हर उम्मीदवार अपने ‘सामथ्र्य’ के हिसाब से धन दे रहा था। इस चुनाव में एक ‘गैर सरकारी’ संगठन के प्रत्याशी डा0 नीरज जिनके बस यही विचार हैं कि ‘देश खतरे में है’,‘मतदाता मेरा भगवान’ काफी चर्चा में है। लोग यह कह रहें हैं कि जब हर खबर बिक रही हो और उसको खरीद कर अपनी लोकप्रियता बढ़ाई जाने की आपा-धापी हो तो ऐसे लोग भी अपनी दुकान चलाने में लग जाते हैं। डा0 नीरज को मात्र 1563 वोट मिले थे पर चुनावों में हर दिन उनकी खबर रहती थी क्योंकि वे चुनाव नहीं बल्कि खबरों के लिए लड़ रहे थे। जितनी ज्यादा उनकी खबरे छपेगी उतना ज्यादा उन्हें बाद में ‘फंडिग’ होगी।
जानकारों के मुताबिक इलाहाबाद में अमर उजाला ने इस बार पैसा नहीं लिया था। जिसका कारण पिछले विधानसभा चुनावों में उसने भाजपा का खूब प्रचार किया था और सरकार तक बनवा रहा था। पर नतीजों के बाद जहां भाजपा गर्त में चली गयी तो वहीं अमर उजाला की छवि भी बहुत खराब हुयी। अपनी गिरी हुयी साख को फिर से बरकरार करने कि लिए उसने अबकी बार खुलेआम तो खबर बेचने का काम नहीं किया। पर रिपोर्टरों ने जरुद कुछ किया। सबसे ज्यादा सर्कुलेशन की वजह से दैनिक जागरण ने इस चुनाव में तकरीबन दो से ढाई करोड़ का व्यापार इन दोनों सीटों पर किया। प्रबधन द्वारा आधिकारिक स्वीकृत के बाद भी प्रत्यक्ष और परोक्ष दो प्रकार का कारोबार हुआ। एक तो वह जो सीधे मालिकों के हाथों गया। दूसरा अच्छी खबरें लिखने और अच्छी फोटो के लिए काम कर रहे पत्रकारों ने अलग से दिहाड़ी वसूली।
खबरें मुख्यतः दो प्रकार की थीं। एक वो स्थान जिसे प्रत्याशी अपने लिए आवंटित कराता था, वहां हूबहू जैसे वह लिखवाकर भेजता था वैसे ही चेप दी जाती थी। दूसरी वो खबरें जिसमें रिपोर्टर अपनी ‘विलक्षण प्रतिभा’ से रिपोर्टिंग कर किसी के पक्ष में तो किसी के खिलाफ माहौल बनाता था। दैनिक जागरण में इलाहाबाद लड़ रहे बसपा के अशोक वाजपेयी की तीन से चार खबरें लगती थीं तो वहीं सपा के रेवती रमण सिंह की एक या दो। इन दोनों की तुलना में भाजपा के योगेश शुक्ला और कांग्रेस के श्याम कृष्ण पाण्डेय नाम मात्र खबरें रहा करती थीं। तो वहीं कभी नेहरु का गढ़ रहे फूलपुर से बसपा के कपिल मुनि करवरिया खबरों के मामले में सपा के श्यामा चरण से डेढ़ गुना आगे थे। भाजपा के करण सिंह पटेल और कांग्रेस धर्मराज पटेल भी नाम मात्र का ही स्थान खबरों में पाए। इन सभी प्रत्याशियों के चुनाव परिणामों पर अगर नजर डाली जाय तो यह निष्कर्ष निकलता है कि खबरों में इनकी उपस्थिति और परिणामों में जमीन आसमान का अंतर है। फूलपुर से लड़ रहे अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनेलाल पटेल और अपना दल के बागी उम्मीदवार प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खबरों और चुनावों परिणामों के काफी अंतर दिखा। प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की जहां खूब खबरें रहा करती थीं तो वहीं अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद सोनेलाल खबरों में नदारद थे। भले ही इसकी जातीय गणित के चलते सोनेलाल को आवश्यकता न थी। इतना ही नहीं प्रदीप के पक्ष में सोनेलाल की नकारात्मक रिपोर्टिंग की गयी। जबकि सोनेलाल को 76699 मत मिले तो वहीं प्रदीप को 1438।
दैनिक जागरण ने कपिल मुनि करवरिया जिनकी बालू माफिया की छवि है का मेकओवर करने के लिए उन पर कई फोटो फीचर छापे। जिसमें कभी वो घर में पूजा करते तो कभी परिवार में शांत भाव में बैठे दिखाई जो उनकी वास्तविक छवि के एकदम विपरीत है और जिसका चुनावी रिपोर्टिंग से कोई मतलब नहीं दिखता। अखबारों ने बसपा की भाई चारा समितियों का जो पुलिंदा बाधा था उसने चुनाव आते-आते अपना भण्डा खुद फोड़ दिया। मतदान के दिन ब्राह्मण भाई-चारा समिति के अध्यक्ष अक्षयवर नाथ पाण्डेय को भुंडा गांव के दलितों ने जबरन अशोक बाजपेयी के पक्ष में वोट डलवाने के चलते नंगाकर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। दरअसल ये जो भी प्रत्याशी थे इनको अपना मेकओवर इसलिए भी करवाना पड़ा क्योंकि कोई छवि ही नहीं थी। जहां करवरिया की पहचान बालू माफिया की थी तो वहीं अशोक वाजपेयी की पहचान कांग्रेस के भगौड़े की थी।
अखबारों में चल रहीं इस रिपोर्टिंग के खिलाफ डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट ही एक ऐसा अखबार था जिसने मोर्चा खोला। 29 मार्च को ‘मीडिया के घोड़े भी चुनावी मैदान में’ सुर्खियों से छपी खबर ने इस गोरख धंधे का खुलासा किया।

आगे नई पीढी

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

१८५७ क्रान्ति सच या मिथक

१८५७ स्वंत्रता संग्राम में भारतीय समाज के दो प्रमुख समुदाय हिन्दुओ और मुस्लिमो के मध्य अभूतपूर्व एकता स्थापित हुई थी और प्रमुख रूप से किसानो ने स्वंत्रता संग्राम में अपनी चेतना को उभारा था जो पूरी तरीके साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ ही थी लेकिन किसानो की इस संगठित आवाज को कुछ सियासी लम्बरदारो ने झुटलाकर अपनी सियाशी रोटिया सेकीऔर इन लम्बरदारो का मकसद काफ़ी समय तक अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए केवल भारतीय जनमानस के मन में विभेदकारी भावनाए जीवित करके अपने आने वाली पीढी के बीच वैमनस्यता के बीज बोंना ही दिखायी पड़ता है देश की प्रमुख पार्टिया जिनका जन्म निषेधकारी नीति पर हुआ है ,स्वंत्रता संग्राम को जनमानस में आदर्श के रूप में तो करते है लेकिन इसके पीछे शायद इनका लक्ष्य समाज में अधिक से अधिक वैम्न्यस्ता के बीज बोना ही होता है जिसके भयावह चेहरे हम बार बार दंगो के रूप में झेलते रहे है१८५७ विद्रोह की शुरुआत तो सैनिको से हुई लेकिन यह बात न जाने क्यो छिप जाता है की वे सैनिक वास्तव में कौन थे ?वास्तविकता में वे कोई और नही "किसान-पुत्र "ही थे जो साम्राज्यवादी शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए आगे आए थे इन किसान पुत्रो ने ही आज़ादी की ऐसी बिगुल बजाई थी जिससे साम्राज्यवादी शासन की नींव हिल गई थी वास्तव में स्वंत्रता संग्राम में जितना उस समय के नवाबो ने अपने प्राण की आहुति देकर नारा बुलंद किया था जिसे हम बहादुरशाह शाह ज़फर के नाम से जानते हैं /उनके वंशज आज रिक्शा चलने को मजबूर हैं /वही दूसरी तरफ़ उस समय के गद्दारों के वंशज आज राजपाट चला रहे हैं /ये गद्दार आज चुनाव तंत्र में शहीदों के नाम पर वोट मांगते हैं /जिसे भारतीय जनमानस को समझना होगा /एक वोट कीमती हैं गद्दारों को उनकी जगह दिखाने को और सही मायने में शहीदों को स्थापित कर पाने के लिए / इसीलिए जनमानस कर्म करे इन्कलाब आएगा /कहते हैं एक पत्थर काफ़ी हैं आसमा में सुराग करने को.........जारी रहेगा /

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

शांत तूफ़ान....

एक देश जो कभी अंतुले के बयान से घबराता है तो कंही रब ने बना दी जोड़ी के सहारे रहता है किसी दूसरे देश में अवतार (ओबामा }जन्म ले ,यज्ञ करता है उसकी अपनी समस्याओं को समाप्त करने के लिए आका का हुक्म आने का इंतज़ार, अपनी निजता को वास्तविकता में खोता नजर आ रहा है वास्तव में भारत शान्ति का प्रतीक है और शांत भी लेकिन ठीक उसी तरह जैसे भयंकर तूफ़ान आने से पहले समुद्र ,सोचनीय यह है की यह तूफ़ान कही अपने ही घरो की सीमा को तबाह करने के लिए तो नही .विश्व में अपने आपको सर्व करने की होड़ में अपनी आंतरिक नीतियों को भूल जाना कुछ हजम नही होता और सच्चाई यही रही है की देश में सत्ता उसी की बनी है जो आंतरिक नीतियों पर चला है लेकिन दुर्भाग्य आंतरिक नीतियों पर कोई सुध्रिड न ही नीति बनी न ही कोई कारवाही,मेहता ,पारीख ,बहूत हुआ फिर सत्यम अब तो हद हो गई ,कारन पहले सेबी बन नही पायी थी और अभी पूर्ण रूप से विकास नही कर पाई ,पहले भारत के दिल (संसद)पर हमला ,फिर भारत की जान मुम्बई पर कारन पहले आन्तरिक खुफिया तंत्र मजबूत और ज्यादा टेक्नीकल नही था और अभी लापरवाह ,देश मंहगाई की आग में समय समय पर जलता है कारन प्रख्यात इकोनोमिस्ट (मनमोहन)महत्वपूर्ण seet पर है ,देश adhyatmik था लेकिन kamjor नही वस्तुतः कमजोर कड़ी को मजबूत कड़ी मानते हुए उसे मजबूत मानना होगा वरना परिणाम नक्सल इंडियन मुजाहिदीन और भी हमारे न सुधरने पर ....जारी रहेगा ....

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

२० जनवरी को जन्मे पितामह.

२० जनवरी एक ऐतिहासिक दिन लेकिन किसके लिए अमेरिका के लिए या एक तरफ़ खड़े पूरे विश्व मंच के लिए शायद यह अब रहस्य न रह जाए /बराक ओबामा ४४ वे और पहले अश्वेत पितामह अमेरिका के ,ने पूरे विश्व में उत्साह पैदा किया है लेकिन शायद विश्व मंच यह भूल रहा है की पितामह अमेरिका के हितों के लिए है न की विश्व मंच के लिए जिसका सीधा परिणाम हम २६/११ हमले में नई नवेली अमेरिकन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के बयान से देख सकते है "अब अमेरिका पाकिस्तान को तीन गुना अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करेगा ताकि लोकतंत्र मजबूत हो सके " इस बयान का मतलब सीधा है की अमेरिका तेल के लिए कुछ भी करेगा /और दूसरी तरफ़ हम आतंक वाद के ख़िलाफ़ एक जुट होंगे का नारा बुलंद कर रहा है /पितामह ने अंतररास्ट्रीय राजनीति से विशेषज्ञता हासिल की है और इसी लिए शायद बयान की तारीफ़ भी कर रहे है ,पितामह जानते है की तेल उत्पादक देशो से पाकिस्तान के रिश्ते मजबूत है और बिना पाकिस्तान से दाल गलाए काम नही चलेगा /और वाकई इनकी विशेषज्ञता को मानना पड़ेगा /बुश जी शायद जूता खाने के बाद सदमे में है खैर पितामह के पिछलग्गों को विवेक मिश्रा की तरफ़ से बध्हाई /जारी रहेगा विवेक मिश्रा

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

एक नज़र

विवेक/चक दे इंडिया में वाकई रंग दे बसंती हो जाए तो निश्चित ही तारे जमी पर आ हीं जायेंगे लेकिन गौरतलब है की जैसे जैसे भारत देश का इतिहास बदला है वैसे वैसे बॉलीवुड के इतिहास में भी कई रंग देखने को मिलते है ,और उसने अपने अच्छे बुरे प्रयासों से हमे कुछ न कुछ या फिर बहुत ज्यादा समय समय पर चेताया है विगत दो सालो में आई फिल्मो की श्रेणी में "चक दे इंडिया "जिसने भारत देश के राष्ट्रीय खेल "हाकी"जिसको स्थानीय खेल जैसा भी सम्मान नही मिल पा रहा है ,को लोगो के मानस पटल केंद्रित करते हुए एक महत्वपूर्ण खेल बताते हुए लोगो के दिलों दिमाग पर छाई तो दूसरी तरफ़ रंग दे बसंती जो आधुनिकता में भटके युंवाओ को अपने अन्दर बदलाव करके देश बदलने का माद्दा पैदा करने का संदेश दे गई तो इन सबसे इतर आस्कर के दौड़ में दौड़ती तारे ज़मी पर ने एवरी चाइल्ड स्पेशल का नारा देते हुए अपने बच्चों को रेस का घोड़ा समझने वालो के मुहँ पर तमाचा मारा और एक ऐसे बाल रोग की तरफ़ दुनिया का ध्यान खिचवाया जिसे हम सभी बच्चों की नौटंकी कहकर नजरअंदाज कर देते थे और दूसरी तरफ़ डीस्लेक्सिया पीड़ित बच्चों को आइन्स्टीन ,लियोनार्दो दा विन्ची ,जो सभी बचपन में इसी रोग से पीड़ित थे के सरल तरीके से प्रस्तुत करते हुए बच्चों के प्रोत्साहन को बढ़ाने का काम किया खैर ,सिनेमा हमारी ही प्रतिक्रया का दर्पण है और अपनी ही प्रतिक्रया देखकर हम कितना सबक लेते हैं यह हमारे ऊपर ही निर्भर है इसीलिए लगे रहो मुन्ना भाई जारी रहेगा........

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

कलम...और चिठ्ठी ............!

विवेक /अभी हालिया में श्याम बेनेगल की फ़िल्म वेलकम टू सज्जनपुर ने एक बार फिर आज के आधुनिक युग में जब संचार के कई आयाम मौजूद है ,तभी e-मेल ,ब्लॉग के जंजाल ,टेलीफोन से बाहर निकलकर हमारी पुरानी संचार व्यवस्था जिसे हम चिट्ठी या फिर पत्र कहते हैं को हमारे मानस पटल पर केंद्रित करते हुए (चिठ्ठी आई है) की याद दिलाई है खैर कलम की ताकत सीमित नही हो सकती की वह कभी पत्रकार या लेखक के हाथो का साधन मात्र बन जाए बल्कि कलम ने स्वय अपनी ताकत से लेखक या पत्रकार को मजबूर किया है की मुझे पकड़ और लिख लेकिन इससे आगे बढ़कर सोचे तो शायद हमारी रक्षा कर रहे जवान हो या घर में आश लगाए माँ बाप जो एक गरीब विकसित देश के अंग है के लिए चिट्ठी, उस कलम स्याही या एक सफ़ेद कागज़ के जोड़ से कही ज्यादा है दोस्तों कलम की ताकत वंहा भी दीखाई देती थी जब डाकिया चाचा कोई चिठ्ठी लेकर महीनो पर किसी दरवाजे पर पहूंचते थे सायद तब यह फक्र की बात होती थी और आज भी ,मुख्य बात यह की चिठ्ठी में जो मार्मिकता ,खुशी,संवेदनशीलता ,अहसाश ,मिलता है शायद वो खुशी अहसाश मेसेज या मेल नही दे पाते हो.......
जारी रहेगा.....